शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

ज्योतिषः आस्था या अन्धविश्वास ?

आस्था या अन्धविश्वास ?
ज्योतिषः
 हमारे देश में ज्योतिष बहुत ही पुराना विषय है, यह जितना पुराना है, उतना ही दिलचस्प और विवादित भी।


हम ज्योतिष जैसे महत्वपूर्ण विज्ञान पर निष्पक्ष भाव से विचार करेंगे। इतिहास की ओर नजर दौड़ाएं तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि ज्योतिष में हमारी सभ्यता और संस्कृति का इस पर गहरा विश्वास है। यह विश्वास फिर इतना मजबूत है कि इसे एक सिरे से नकारा नहीं जा सकता। ज्योतिष को हम याहे जिस भी रुप में लें पर इसकी भविष्यवाणियां तो पूरी तरह से सत्य होती हैं और ही असत्य। इसलिए अलग अलग लोगों की अलग अलग प्रतिक्रियाएं होती हैं। ज्योतिष की जितनी भी शाखाएं हैं, उन सबकी अपनी-अपनी मान्यताएं ,मत या तर्क है।
ज्योतिष की बहुत सारी परम्पराएं हैं जैसे वैदिक ज्योतिष ,पश्चिमी ज्योतिष, चीनी ज्योतिष। सवाल है लोगों का इसके प्रति आकर्षण और आस्था का। जो अपने कर्म पर भरोसा नहीं करते उन्हें भाग्य पर भरोसा ज्यादा होता है और जो भाग्य पर भरोसा नहीं करते उन्हें अपने कर्म पर ही विश्वास होता है। और यहीं से ज्योतिष पर आस्था और अंधविश्वास का सवाल खड़ा हो जाता है। ऐसा क्यों है कि ज्योतिष, जो इतना पुराना विषय है, उस पर आज तक कोई प्रमाणिक फैसला नहीं हो पाया।
कुछ लोग हस्तरेखा-शास्त्र पढ़ते हैं तो कुछ संख्या विज्ञान, कुछ टैरो द्वारा भविष्यफल बताते हैं, यानी सबके लिए ज्योतिष के अलग-अलग मायने हैं।


आस्तिक और नास्तिक दोनो तरह के लोग जब भी अपनी समस्याओं के आगे लाचार हो जाते हैं तो थक-हार कर ज्योतिष में विश्वास करने पर विवश हो जाते हैं। यहाँ सवाल ज्योतिष के प्रमाणिकता या अप्रमाणिकता का नहीं है, सवाल है लोगों की आस्था या अनास्था का। इतना तो तय है कि ज्योतिष की कार्य प्रणाली विज्ञान पर आधारित है, ग्रह नक्षत्र को विज्ञान ने ढूँढा है अतः यह गलत नहीं हो सकते। गलत हो सकते हैं भविष्य के अनुमान, जो ज्योतिष द्वारा लगाया जाता है।
ऐसे लोग जो ज्योतिष में आस्था रखते हैं, उनके अपने अनुभव को झुठलाया नहीं जा सकता। जो नहीं विश्वास रखते उन्हें ज्योतिष को मानने पर विवश भी नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार ईश्वर के होने या होने पर विवाद है उसी तरह का विवाद ज्योतिष पर भी है। परंतु जो लोग ज्योतिष पर विश्वास नहीं करते और ईश्वर की पूजा-अर्चना करते है क्या उन्होनें कभी किसी भगवान को देखा है ? या किसी देवी के साक्षात दर्शन किए हैं? नहीं। फिर भी तीर्थ यात्राएं करते हैं? इसलिए कि उनकी आस्था होती है। पश्चिमी देशों में तो हमारे ईश्वरों का मजाक तक बनाया जाता है वहाँ कोई शंकर, विष्णु या राम जैसी अवधारणा नहीं है, वहाँ केवल ईषा मसीह है, फिर भी ,वे ज्योतिष की सत्ता को स्वीकार करते हैं।
कुल मिलाकर इतना जरूर कहा जा सकता है कि ज्योतिष एक अनुमान है कि पूर्णतः सत्य। हो सकता है किसी ने ज्योतिष को मानकर अपना जीवन सफल बनाया हो पर ज्योतिष पर सब लोग एक बराबर आस्था बनाएं रखे यह जरूरी नहीं है। सच तो यह है कि जरूरत से ज्यादा आस्था ही अंधविश्वास बन जाती है अतः जरूरी यह है कि अपने कर्म और ज्योतिष में संतुलन बनाया जाए।
ऐसे वर्ग के लोगों का ज्योतिष पर आस्था कुछ ज्यादा हीं होती है तथा उनका जीवन ज्योतिष से ही संचालित होता है। इसके साथ ही एक वर्ग ऐसा भी है जो तो ज्योतिष को मान्यता देता है और हीं किसी तरह के शुभ मूहुर्त उसके लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए ज्योतिष के बारे में एक बात सटीक बैठती है, मानो तो देव नहीं तो पत्थर।
भाग्य, किस्मत और मुहूर्त की प्रतीक्षा करने वाला व्यक्ति प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से ज्योतिष से जुड़ा होता है।
हमें इस वाद-विवाद से कुछ नहीं लेना,क्योंकि हमारी दुश्मनी या दोस्ती ज्योतिष से नहीं है।
यह आस्था और अंधविश्वास के बीच का विषय है, जिसमें वाद-विवाद का अंतहीन सिलसिला चल सकता है।

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